यारी....

 यारी 

इस वीरानी महफ़िल में अब यार नहीं है ,

स्वार्थ देख आए और तन्हाई में छोड़ जाए,

यदि हो न सके मेरे तो क्यों उम्मीद जगाए?

मेरी खिदमत का किसी को इक पल भी विचार नहीं है ,

इस वीरानी महफ़िल में अब यार नहीं है ।


हुआ हर किसी को मुनाफा मेरी नादानी से ,

कहूं इसे अपनी खता या कहूं ग्लानि इसे,

व्यर्थ किया है मैंने वक्त, नहीं है जिसका कोई अर्थ ,

यादगार लम्हों का यहां कोई कारोबार नहीं है ,

इस वीरानी महफ़िल में अब यार नहीं है ।


मैंने सुना था असलियत की पहचान विपदा में होती है ,

मगर हकीकत तो इससे भी भयावह होती है ,

मैंने सुख में न सहीं, मगर दुःख में सबसे पहले हाथ बढ़ाया है ,

तुम्हारी खुदगर्जी मेरे स्नेह की हकदार नहीं है ,

इस वीरानी महफ़िल में अब यार नहीं है ।



भीड़ की चोट जब मैंने खाई, मेरे एकांत ने संभाला है ,

बोला- फरेब की दुनिया में आखिर क्यूं आस लगाना है ?

अतीत का देखो अंजाम ,भविष्य में न रहे कोई मलाल,

कर यक़ीन तू खुदपर तू किसी साथ का कर्जदार नहीं है ,

इस वीरानी महफ़िल में अब यार नहीं है ।



~ लक्षिता उपाध्याय

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