Leaving home 🏡 and going for my College👩🎓
बिछड़ना जरूरी नहीं, मजबूरी है। आँखों में कुछ सपनें है, उन सपनों से जुड़े मेरे अपनें है, मन में घबराहट है, दूर हो जाने की आहट है, अब तो बस यादों की हमजोली है, मैं भी क्या करूँ? बिछड़ना जरूरी नहीं, मजबूरी है। जानें की प्रसन्नता भी है फाँसले बढ़ जाने की चिन्ता भी है, माँ की फरियाद, भाई जैसी ढ़ाल और पिता की हर पल याद, ये सभी मेरी कमजोरी है, मैं भी क्या करूँ? बिछड़ना जरूरी नहीं, मजबूरी है। माँ कहती है, घर काँटने दौड़ता है, ये सूनापन ह्रदय कचोटता है, पूरा दिन सजदे में रहता है, एक झलक पाने को मन तरसता है, फुर्सत की चाह तो मेरी भी मर्जी है, मैं भी क्या करूँ? बिछड़ना जरूरी नहीं, मजबूरी है। ~ लक्षिता उपाध्याय