A poem for widow's empowerment
जीने का हक ही छीन लिया!

किया रंगों से वंचित
शौक से बाधित
लोगों का ज़मीर इस कदर गिर गया कि
एक बेवा के जीने का हक ही छीन लिया ।
विपदा का घड़ा तो उस पर भी था फूटा
अरे, उसको तो खुद परमात्मा ने लूटा
उसके ख्वाबों का अम्बर, अधर में गिर गया
एक बेवा के जीने का हक ही छीन लिया।
बहुत कुछ मिट चुका है पहले ही ,अब तुम बिंदी सिंदूर भी मिटा रहे
टूट चुका सपनों का घरौंदा, अब तुम चूडिय़ां भी चटका रहे
मायके से तो पहले ही चली गई, ससुराल ने भी ऐसा पराया किया
एक बेवा के जीने का हक ही छीन लिया।
ना जाने कितनों पर गिरा ये कहर का फंदा है
मैंने सुना है 25 करोड़ में 15 करोड़ ऐसे ही जिंदा है
जो न रहा उससे प्यार है किया, और जो जी रहा उसका जीना दुश्वार है किया
एक बेवा के जीने का हक ही छीन लिया।
क्यूँ ना उन्हें हम अपनाए
कुछ नहीं तो उन्हें उनके हक दिलाए
सती प्रथा हटाकर गर्व है किया, फिर क्यों जीते जी इस कदर मुर्दा किया?
एक बेवा के जीने का हक ही छीन लिया।
~ लक्षिता उपाध्याय
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