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Showing posts from March 17, 2025

यारी....

 यारी  इस वीरानी महफ़िल में अब यार नहीं है , स्वार्थ देख आए और तन्हाई में छोड़ जाए, यदि हो न सके मेरे तो क्यों उम्मीद जगाए? मेरी खिदमत का किसी को इक पल भी विचार नहीं है , इस वीरानी महफ़िल में अब यार नहीं है । हुआ हर किसी को मुनाफा मेरी नादानी से , कहूं इसे अपनी खता या कहूं ग्लानि इसे, व्यर्थ किया है मैंने वक्त, नहीं है जिसका कोई अर्थ , यादगार लम्हों का यहां कोई कारोबार नहीं है , इस वीरानी महफ़िल में अब यार नहीं है । मैंने सुना था असलियत की पहचान विपदा में होती है , मगर हकीकत तो इससे भी भयावह होती है , मैंने सुख में न सहीं, मगर दुःख में सबसे पहले हाथ बढ़ाया है , तुम्हारी खुदगर्जी मेरे स्नेह की हकदार नहीं है , इस वीरानी महफ़िल में अब यार नहीं है । भीड़ की चोट जब मैंने खाई, मेरे एकांत ने संभाला है , बोला- फरेब की दुनिया में आखिर क्यूं आस लगाना है ? अतीत का देखो अंजाम ,भविष्य में न रहे कोई मलाल, कर यक़ीन तू खुदपर तू किसी साथ का कर्जदार नहीं है , इस वीरानी महफ़िल में अब यार नहीं है । ~ लक्षिता उपाध्याय