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अफ़वाह 🗣

अफ़वाह  मांगा जब खुद के लिए कुछ सूकून भरे पल  उसने साजिश कर मेरे हिस्से में कहर की सुई घुमाई है  खुशफहमी से सबका हो गया था नाता  ऐ वक़्त ! तुमने भी क्या अफ़वाह सुनाई है।  ढूँढ रहीं थीं जब अपनी बीमारी का इल्म  मेरी गर्दिश पर उमड़ पड़ी झूठी परवाह दिखाई है  किरदार पर निरंतर लगता रहा मेरे दाग  ऐ वक़्त ! तुमने भी क्या अफ़वाह सुनाई है।  बिना अस्तित्व की ख़बरों से भरे अखबार है  जिन पर बड़े अक्षरों में मुझ पर हुए व्यंग की छपाई है  बना उपहास एक छोर से दूसरे छोर तक  ऐ वक़्त ! तुमने भी क्या अफ़वाह सुनाई है।  लिखनी पड़ती हैं अपनी आपबीती की व्यथा  प्रत्यक्ष प्रमाण स्वयं न दे ,ये तहजीब मेरे मौन ने मुझे सिखाई है  कटघरे में खड़ा कर बनाया मुझे हर बार गुनाहगार  ऐ वक़्त ! तुमने भी क्या अफ़वाह सुनाई है।  खड़ा कर अर्थ- अनर्थ के बीच  मेरे असमंजस ने ये कैसी राह दिखाई है  किया जोश में बहरा, क्रोध से अंधा  ऐ वक़्त ! तुमने भी क्या अफ़वाह सुनाई है।  ~ लक्षिता उपाध्याय