A poem on Manipur Issue
आखिर क्यूँ? जब जान मुश्किल में आ जाती है एक दहशत सी छा जाती है घर की तिजोरी किसी के हवस का शिकार हो जाती है आखिर क्यूं ये दुनिया मौन रह जाती है । घटना मई में घटती है , ख़बरें जुलाई में छपती हैं थाने की दर्ज शिकायत भी कहा टिक पाती है जब जातिवाद का विवाद महिला बन जाती हैं आखिर क्यूं ये दुनिया मौन रह जाती है । जब भेड़िये की जमात जंगल से उठ बस्ती में आ जाती है रौंदता देख फूलों को तितली 'एहसास- ए- मौत' सुनाती है निर्वस्त्र परेड करने को जब वो बाध्य हो जाती है आखिर क्यूं ये दुनिया मौन रह जाती है। खुद तो लिपटे दरिंदगी के परिधान में छोड़े ही नहीं चिथड़ा उसकी चाम पे वो मदद की गुहार लगाती जाती हैं, और चश्मदीद अंजान नजर आती है आखिर क्यूं ये दुनिया मौन रह जाती है। जहाँ रात भारी है शाम पर अब चर्चा नहीं हो सकती वहाँ घाम पर 'सेवन सिस्टर्स' वाले राज्य की चिड़ियां जब बाज से तंग हो जाती हैं आखिर क्यूं ये दुनिया मौन रह जाती हैं। ~ लक्षिता उपाध्याय