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A poem on Manipur Issue

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आखिर क्यूँ? जब जान मुश्किल में आ जाती है  एक दहशत सी छा जाती है  घर की तिजोरी किसी के हवस का शिकार हो जाती है  आखिर क्यूं ये दुनिया मौन रह जाती है । घटना मई में घटती है , ख़बरें जुलाई में छपती हैं  थाने की दर्ज शिकायत भी कहा टिक पाती है  जब जातिवाद का विवाद महिला बन जाती हैं  आखिर क्यूं ये दुनिया मौन रह जाती है । जब भेड़िये की जमात जंगल से उठ बस्ती में आ जाती है  रौंदता देख फूलों को तितली 'एहसास- ए- मौत' सुनाती है  निर्वस्त्र परेड करने को जब वो बाध्य हो जाती है  आखिर क्यूं ये दुनिया मौन रह जाती है।  खुद तो लिपटे दरिंदगी के परिधान में  छोड़े ही नहीं चिथड़ा उसकी चाम पे  वो मदद की गुहार लगाती जाती हैं, और चश्मदीद अंजान नजर आती है  आखिर क्यूं ये दुनिया मौन रह जाती है।  जहाँ रात भारी है शाम पर  अब चर्चा नहीं हो सकती वहाँ घाम पर  'सेवन सिस्टर्स' वाले राज्य की चिड़ियां जब बाज से तंग हो जाती हैं  आखिर क्यूं ये दुनिया मौन रह जाती हैं।  ~ लक्षिता उपाध्याय 

पैसा 💸💸

पैसा एक पल को ईमान किसी का भी मचल जाए  जब बात पैसे की हो कि हो जाए लोग कहते है कि संघर्ष सपनो को पंख लगाता है मगर वो संघर्ष भी शर्मसार हो जाता है जहां सपने महंगे भाव में बिक जाए  जब बात पैसे की हो कि हो जाए बदलते मौसम का लुफ्त उठाने का जी मेरा भी करता है, ख्वाहिशो की झोली को भरने का जी मेरा भी करता है, मगर ये मन का रोगी मंहगे ईलाज सोचकर बीमार होने से डर जाए , जब बात पैसे की हो कि हो जाए ये मेहनत को भी आंकड़ो में तोल देता है वो शख्स जिसके सिर के केश न रहे, रौशनी भरे वो नेत्र न रहे,  दिन भर की थकान के बाद भी उसकी नींद ओझल सी हो जाए  जब बात पैसे की हो कि हो जाए इस पैसे की औकात तो देखो इसने खून के रिश्तों में भी मार करा डाली बिताया था जिस आँगन में बचपन उसमें भी दरार कर डाली  लड़ सकते थे पूरी दुनिया से जिसकी खातिर वो भी दुश्मन सा लग जाए  जब बात पैसे की हो कि हो जाए  डूबा देती है ये काग़ज़ की कश्ती सवार होती जब इसपर लालच भरी हस्ती  कमा कितना भी लो मगर सुकून कहा से लाओगे,घर तो बन जाएगा मगर घरवाले कहा से लाओगे ठहर जाओ कहीं मुक्कमल 'अति का अंत' ना हो जाए...