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ये अँधेरे स्थायी नहीं है...

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 ये अँधेरे स्थायी नहीं है।  घिरे हुए तुम काँटो से, अथाह दुख भरी यादो से, भले ही कोई आधार नजर न आए, हर जगह बस अंधकार सा ही छाए, मत सोचना कि इसके सिवा कोई उपाय नहीं है, याद रहे, ये अँधेरे स्थायी नहीं है। इस चहल-पहल में भी कुछ सूनापन है, लोगो की भीड़ में भी कहीं अकेलापन है, कानों में गूंजता तानों भरा गाना है, सुनकर जिसे मन का संताप उभर आता है, नाजुक वक्त की फिजाओं में हवाए नहीं है, याद रहे, ये अँधेरे स्थायी नहीं है। दुख में अकेले है सुख में जमाना है, जो फितरत बदलते एक क्षण नही लगाता है, डूबे सूरज को कल वापस लौटकर आना है, तकलीफ से तो बस तुम्हारा संयम आजमाना है, गिरकर उठने से बेहतर कोई न्याय नहीं है, याद रहे, ये अँधेरे स्थायी नहीं है।   ~ लक्षिता उपाध्याय