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नींद 😴

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अब नींद भी ले लो थोड़ी काम है जरूरी, सुकून से हो गई दूरी, बस लालसा में बीत रही जिन्दगी पूरी, फिर भी रह ही जा रही कोशिश थोड़ी-थोड़ी, बस भी करो जी हजूरी, अब नींद भी ले लो थोड़ी।   ऐसा कमाया ही क्या जो नसीब ही न हो, सुख-चैन त्यागा ही क्या जिसका ओर-छोर न हो, वक्त बीत जाता है, साल बदल जाते है, मगर ख्वाहिशो के दामन जस-के-तस रह जाते है, चिन्ता को चिन्तन में बदलने की करो कोशिश पूरी, अब नींद भी ले लो थोड़ी। लोग बचपन में ही पचपन को जी रहे है, उम्र से पहले ही हकीकत को ढक रहे है, बस "और ज्यादा" की चाह में तप रहे है, आडंबर की दुनिया में मौजूदगी से वंचित हो रहे है, "तृष्णा "भरी दौड़ आखिर तुमने ही तो छेड़ी, अब नींद भी ले लो थोड़ी। ~लक्षिता उपाध्याय