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Showing posts from 2022

ये अँधेरे स्थायी नहीं है...

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 ये अँधेरे स्थायी नहीं है।  घिरे हुए तुम काँटो से, अथाह दुख भरी यादो से, भले ही कोई आधार नजर न आए, हर जगह बस अंधकार सा ही छाए, मत सोचना कि इसके सिवा कोई उपाय नहीं है, याद रहे, ये अँधेरे स्थायी नहीं है। इस चहल-पहल में भी कुछ सूनापन है, लोगो की भीड़ में भी कहीं अकेलापन है, कानों में गूंजता तानों भरा गाना है, सुनकर जिसे मन का संताप उभर आता है, नाजुक वक्त की फिजाओं में हवाए नहीं है, याद रहे, ये अँधेरे स्थायी नहीं है। दुख में अकेले है सुख में जमाना है, जो फितरत बदलते एक क्षण नही लगाता है, डूबे सूरज को कल वापस लौटकर आना है, तकलीफ से तो बस तुम्हारा संयम आजमाना है, गिरकर उठने से बेहतर कोई न्याय नहीं है, याद रहे, ये अँधेरे स्थायी नहीं है।   ~ लक्षिता उपाध्याय 

नींद 😴

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अब नींद भी ले लो थोड़ी काम है जरूरी, सुकून से हो गई दूरी, बस लालसा में बीत रही जिन्दगी पूरी, फिर भी रह ही जा रही कोशिश थोड़ी-थोड़ी, बस भी करो जी हजूरी, अब नींद भी ले लो थोड़ी।   ऐसा कमाया ही क्या जो नसीब ही न हो, सुख-चैन त्यागा ही क्या जिसका ओर-छोर न हो, वक्त बीत जाता है, साल बदल जाते है, मगर ख्वाहिशो के दामन जस-के-तस रह जाते है, चिन्ता को चिन्तन में बदलने की करो कोशिश पूरी, अब नींद भी ले लो थोड़ी। लोग बचपन में ही पचपन को जी रहे है, उम्र से पहले ही हकीकत को ढक रहे है, बस "और ज्यादा" की चाह में तप रहे है, आडंबर की दुनिया में मौजूदगी से वंचित हो रहे है, "तृष्णा "भरी दौड़ आखिर तुमने ही तो छेड़ी, अब नींद भी ले लो थोड़ी। ~लक्षिता उपाध्याय 

On the occasion of International Women's Day

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अब तुम सबल बनो। नारी, अब तुम सबल बनो, तुम हर चुनौती को अटल रहो, बिखेर न सके कोई तुम्हे, तुम मैदान-ए-जंग में प्रबल बनो, फूल सा स्वरूप तुम्हारा, खुद को चिंगारी से अवगत करो, औरों को तो बहुत किया, अब अपना निर्माण स्वंय करो, नारी, अब तुम सबल बनो। कोई दया करे तो मत अपनाओ, अगर घृणा करे तो मत घबराओ, दहलीज लाँघकर देखो संसार नजर आयेगा, जो आज करता तुम्हारी निंदा कल वो शर्मसार नजर आयेगा, मर्यादा की हर बंदिश को तुम खुद से पहले खत्म करो, नारी, अब तुम सबल बनो। तुम युद्ध में जीत कर आने के लिए काफी हो, तुम सहारे के नहीं बल्कि सराहने के काबिल हो, किसी दिवस की आवश्यकता नहीं तुम्हारी कद्र जताने को, तुम्हारा स्वरूप ही काफी है, तुम्हारा अस्तित्व बताने को, लोग क्या कहेंगे यह उन पर ही निर्भर करो, नारी,अब तुम सबल बनो। ~लक्षिता उपाध्याय 

Leaving home 🏡 and going for my College👩‍🎓

बिछड़ना जरूरी नहीं, मजबूरी है। आँखों में कुछ सपनें है, उन सपनों से जुड़े मेरे अपनें है,  मन में घबराहट है, दूर हो जाने की आहट है, अब तो बस यादों की हमजोली है, मैं भी क्या करूँ? बिछड़ना जरूरी नहीं, मजबूरी है। जानें की प्रसन्नता भी है फाँसले बढ़ जाने की चिन्ता भी है, माँ की फरियाद, भाई जैसी ढ़ाल और पिता की हर पल याद, ये सभी मेरी कमजोरी है, मैं भी क्या करूँ? बिछड़ना जरूरी नहीं, मजबूरी है। माँ कहती है, घर काँटने दौड़ता है, ये सूनापन ह्रदय कचोटता है, पूरा दिन सजदे में रहता है, एक झलक पाने को मन तरसता है, फुर्सत की चाह तो मेरी भी मर्जी है, मैं भी क्या करूँ? बिछड़ना जरूरी नहीं, मजबूरी है। ~ लक्षिता उपाध्याय 

मैं नास्तिक ही सही

मैं नास्तिक ही सही। आस्था रखने से ही काम बनते, तो तीर्थ स्थल पर मृतक न मिलते, दक्षिणा देने से ही पुण्य मिलता, तो पंडितो का धंधा कैसे चलता, यदि घर-घर लक्ष्मी का सम्मान होता, तो पुत्री होने पर कभी अवसाद न होता, तुम कहते हो खुदा बेहद अजीज होता है, मैं कहती हूँ वो छीन लेता है, जो हमारे अत्यंत करीब होता है, नशा करने से शिव का कुछ न बिगड़ेगा, तुम करके देखो तुम्हारा सब कुछ उजड़ेगा, तुम कहते हो ईश्वर सबको पार लगाता हैं, मैं कहती हूँ मझधार में फंसकर तो देखो, कौन बचाने आता है? तुम कहते हो तुमने कन्या को देवी बनते देखा है, मैं कहती हूँ, मैनें उसी कन्या से उसका बचपन छिनते देखा है, महाभारत में तुमने अर्जुन का रण देखा, पर मैनें तो कर्ण के संग कृष्ण का किया क्षल देखा, द्रौपदी की रक्षा का कवच जिसनें (कृष्ण ने) बनाया, तुम ही बताओ क्या वो कभी तुम्हारी (स्त्री की) रक्षा को आया? हाँ, मैं मंदिरो में शीश नहीं झुकाती हूँ, क्योंकि भक्तों की कतार में दरिदों को पाती हूँ, तुम कहोगे कि ये प्रभु की माया है, मेरा मन प्रार्थना में कभी नहीं लग पाया है, बिना वास्तविकता मैं मान जाऊँ ये मुनासिब ही नहीं, इन आस्तिकों की भ...

Expressing tiredness 😤 on weekend 😇

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चाय तो बनती है। ☕ बहुत देर हो गयी, सुबह से शाम हो गयी, भरपूर थकान हो गयी, संवारी थी जो शख्सियत वो आम हो गयी, खुशबू से ही मैं बाग-बाग हो गयी, अब चाय तो बनती है। फ्लेवर में मिल जाए अदरक, मिट जाए जिससे सारा सिरदर्द, मिलावट में भले ही थोड़ा पानी हो, 'तलप' लगने पर ना मिले तो परेशानी हो, बिन कहे ही मिल जाए तो वाहवाही हो, अब चाय तो बनती है। ~ लक्षिता उपाध्याय 

गरीबी

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They says!!!

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#  Different doesn't mean wrong 🙃