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यारी....

 यारी  इस वीरानी महफ़िल में अब यार नहीं है , स्वार्थ देख आए और तन्हाई में छोड़ जाए, यदि हो न सके मेरे तो क्यों उम्मीद जगाए? मेरी खिदमत का किसी को इक पल भी विचार नहीं है , इस वीरानी महफ़िल में अब यार नहीं है । हुआ हर किसी को मुनाफा मेरी नादानी से , कहूं इसे अपनी खता या कहूं ग्लानि इसे, व्यर्थ किया है मैंने वक्त, नहीं है जिसका कोई अर्थ , यादगार लम्हों का यहां कोई कारोबार नहीं है , इस वीरानी महफ़िल में अब यार नहीं है । मैंने सुना था असलियत की पहचान विपदा में होती है , मगर हकीकत तो इससे भी भयावह होती है , मैंने सुख में न सहीं, मगर दुःख में सबसे पहले हाथ बढ़ाया है , तुम्हारी खुदगर्जी मेरे स्नेह की हकदार नहीं है , इस वीरानी महफ़िल में अब यार नहीं है । भीड़ की चोट जब मैंने खाई, मेरे एकांत ने संभाला है , बोला- फरेब की दुनिया में आखिर क्यूं आस लगाना है ? अतीत का देखो अंजाम ,भविष्य में न रहे कोई मलाल, कर यक़ीन तू खुदपर तू किसी साथ का कर्जदार नहीं है , इस वीरानी महफ़िल में अब यार नहीं है । ~ लक्षिता उपाध्याय

A poem for widow's empowerment

जीने का हक ही छीन लिया! किया रंगों से वंचित शौक से बाधित  लोगों का ज़मीर इस कदर गिर गया कि  एक बेवा के जीने का हक ही छीन लिया । विपदा का घड़ा तो उस पर भी था फूटा  अरे, उसको तो खुद परमात्मा ने लूटा  उसके ख्वाबों का अम्बर, अधर में गिर गया  एक बेवा के जीने का हक ही छीन लिया।  बहुत कुछ मिट चुका है पहले ही ,अब तुम बिंदी सिंदूर भी मिटा रहे  टूट चुका सपनों का घरौंदा, अब तुम चूडिय़ां भी चटका रहे  मायके से तो पहले ही चली गई, ससुराल ने भी ऐसा पराया किया  एक बेवा के जीने का हक ही छीन लिया।  ना जाने कितनों पर गिरा ये कहर का फंदा है  मैंने सुना है 25 करोड़ में 15 करोड़ ऐसे ही जिंदा है  जो न रहा उससे प्यार है किया, और जो जी रहा उसका जीना दुश्वार है किया  एक बेवा के जीने का हक ही छीन लिया।  क्यूँ ना उन्हें हम अपनाए  कुछ नहीं तो उन्हें उनके हक दिलाए  सती प्रथा हटाकर गर्व है किया, फिर क्यों जीते जी इस कदर मुर्दा किया? एक बेवा के जीने का हक ही छीन लिया।  ~ लक्षिता उपाध्याय